भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५१ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में स्वराशि में स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की आमदनी में वृद्धि होती है तथा शत्रु पक्ष से विशेष लाभ मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है, परन्तु बाद में बड़ा गुणी, चतुर तथा विद्वान् भी बनता है। सन्तान-पक्ष से त्रुटिपूर्ण साथ प्राप्त होता है। १०५८ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनु लग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से लाभ भी होता है। झगड़े तथा शत्रुओं के कारण कुछ परेशानी होती है, परन्तु अपनी चतुराई से लाभ भी उठाता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर पूर्ण प्रभाव स्थापित होता है। ऐसा व्यक्ति संघर्षपूर्ण जीवन बिताता है। १०५९ 'धनु' लग्न में 'शनि' 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनुलग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है। परिश्रम से धन तथा कुटुम्ब का सुख मिलता है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में तृतीय भाव को देखने से पराक्रम तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। दसवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य १०६०