भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
४५१ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में स्वराशि में स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की आमदनी में वृद्धि होती है तथा शत्रु पक्ष से विशेष लाभ मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है, परन्तु बाद में बड़ा गुणी, चतुर तथा विद्वान् भी बनता है। सन्तान-पक्ष से त्रुटिपूर्ण साथ प्राप्त होता है। १०५८ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनु लग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से लाभ भी होता है। झगड़े तथा शत्रुओं के कारण कुछ परेशानी होती है, परन्तु अपनी चतुराई से लाभ भी उठाता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर पूर्ण प्रभाव स्थापित होता है। ऐसा व्यक्ति संघर्षपूर्ण जीवन बिताता है। १०५९ 'धनु' लग्न में 'शनि' 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनुलग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है। परिश्रम से धन तथा कुटुम्ब का सुख मिलता है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में तृतीय भाव को देखने से पराक्रम तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। दसवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य १०६०
४५२ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का पर्याप्त सुख प्राप्त होता है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कुछ कमी रहती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का अल्प सुख मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। दसवीं उच्चदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी खूब रहती है तथा कभी-कभी आकस्मिक धन-लाभ भी होता है। १०६१ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में विशेष वृद्धि होती है तथा भाई- बहिन का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है। तीसरी नीचदृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान-पक्ष से कष्ट होता है तथा विद्या-बुद्धि में कमी रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा यश की उन्नति होती है परन्तु धर्म में श्रद्धा कम रहती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों का सम्बन्ध भी लाभदायक सिद्ध नहीं होता। १०६२ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को माता के सुख में कमी रहती है तथा भूमि, भवन का सामान्य सुख प्राप्त होता है। भाई-बहिन तथा कुटुम्ब का सुख भी असन्तोषजनक रहता है। तीसरी मित्रदृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है तथा झगड़ों से लाभ भी होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने से १०६३ पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र की उन्नति होती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी आती है।
४५३ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित नीच के 'शनि' के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा विद्या, बुद्धि के क्षेत्र में कमी रहती है। तीसरी मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। सातवीं उच्चदृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी खूब रहती है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीय भाव को देखने से कौटुम्बिक सुख तथा धन-संचय के लिए गुप्त युक्तियों का आश्रय लेना पड़ता है तभी सामान्य सफलता मिलती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : षष्ठभाव : शनि छठे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर भारी प्रभाव रखता है तथा झगड़ों से लाभ उठाता है। कुटुम्बियों से कुछ विरोध भी रहता है। तीसरी शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु में वृद्धि होती है, परन्तु पुरातत्त्व का लाभ कम होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है। बाहरी संबंधों से भी हानि होती है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों से वैमनस्य रहता है, परन्तु पराक्रम की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति हिम्मती तथा पुरुषार्थी होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को स्त्री का लाभ तो होता है, परन्तु उससे सुख कम ही मिलता है, तथापि दैनिक व्यवसाय में पर्याप्त लाभ होता है। भाई-बहिन तथा कुटुम्बियों से अच्छे संबंध रहते हैं। तीसरी शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य के क्षेत्र में रुकावटें आती हैं। सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शरीर में कुछ कष्ट रहता है। दसवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी आ जाती है और उसे अपना स्थान छोड़कर परदेश में भी रहना पड़ता है।
४५४ 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का भी लाभ होता है। दैनिक सुख, धन-संचय तथा भाई-बहिन के सुख में कमी रहती है। तीसरी मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को देखने से धन-कुटुम्ब का सामान्य सुख मिलता है। दसवीं [चित्र: कुण्डली १०६७] नीच-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के पक्ष में कमी बनी रहती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : नवमभाव : शनि नवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को भाग्योन्नति एवं धर्म- पालन में बाधाएं आती हैं। धन-कुटुम्ब का सामान्य- सुख मिलता है। तीसरी मित्र तथा उच्च-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी खूब रहती है तथा कभी-कभी आकस्मिक धन-लाभ भी होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि [चित्र: कुण्डली १०६८] होती है। दसवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है तथा झगड़े-झंझटों से लाभ होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : दशमभाव : शनि दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को पिता से सहयोग, राज्य से सम्मान तथा व्यवसाय से लाभ मिलता है। भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। तीसरी शत्रु- दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्ध भी असन्तोषजनक रहते हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से [चित्र: कुण्डली १०६९] माता, भूमि एवं भवन के सुख में कमी रहती है। दसवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री-पक्ष से सुख तथा दैनिक व्यवसाय में सफलता की प्राप्ति होती है।
४५५ 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आमदनी में विशेष वृद्धि होती है। कभी-कभी आकस्मिक धन-लाभ भी होता है। कुटुम्ब तथा भाई-बहिनों के सुख एवं पराक्रम में भी वृद्धि होती है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी आती है। सातवीं नीच तथा शत्रु-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान से कष्ट मिलता है तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में कमी रहती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है परन्तु दैनिक जीवन में परेशानियों का अनुभव होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों का संबंध भी असन्तोषजनक रहता है। धन-कुटुम्ब तथा भाई-बहिन के सुख में भी कमी रहती है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में तीसरे भाव को देखने से धन-कुटुम्ब का सामान्य सुख प्राप्त होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु- पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है तथा गुप्त युक्तियों के सहारे लाभ भी मिलता है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्योन्नति में कठिनाइयां आती हैं तथा धर्म का पालन भी पूर्ण रूप से नहीं हो पाता। 'धनु' लग्न में 'राहु' 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनु लग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कमी आती है। कभी-कभी कठिन शारीरिक कष्ट भी उठाना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति देखने में सज्जन परन्तु भीतर से चालाक होता है।
४५६ 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनु लग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक के धन तथा कुटुम्ब के सुख में कमी रहती है। कभी-कभी कौटुम्बिक कारणों से घोर संकटों का शिकार भी बनना पड़ता है। उसे प्रायः ऋण लेकर अपना काम चलाना पड़ता है। अपनी कठिनाइयों पर यह गुप्त युक्तियों द्वारा विजय पाने का प्रयत्न करता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनु लग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक बड़ा हिम्मती तथा बहादुर होता है। भाई-बहिनों के साथ उसके सम्बन्ध सुखकर नहीं रहते। उसे कभी-कभी घोर संकटों का सामना भी करना पड़ता है, परन्तु धैर्यवान् तथा साहसी होने के कारण उन्हें चुपचाप सहन कर लेता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनु लग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को माता के सुख में बड़ी कमी रहती है। भूमि तथा भवन का सुख भी नहीं मिलता। कभी-कभी घोर मुसीबतें भी उठानी पड़ती हैं। धैर्य तथा गुप्त युक्तियों के बल पर यह संकटों का सामना करता रहता है।
४५७ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनुलग्न : पंचमभाव : राहु पाँचवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष से कष्ट प्राप्त होता है तथा विद्याध्ययन में भी बड़ी कठिनाइयां तथा कमी रहती है। उसकी बोली में रूखापन रहता है। वह धैर्य तथा गुप्त युक्तियों के बल पर काम तो चलाता है, परन्तु चिन्ताओं से घिरा रहता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनुलग्न : षष्ठभाव : राहु छठे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर अत्यन्त प्रभाव रखता है तथा चातुर्य एवं गुप्त युक्तियों के बल पर उन्हें परास्त करता रहता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, बहादुर तथा धैर्यवान् होता है। वह मातृ-पक्ष को भी कुछ हानि पहुँचाता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनुलग्न : सप्तमभाव : राहु सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित उच्च के राहु के प्रभाव से जातक की स्त्री-पक्ष की विशेष शक्ति मिलती है। उसके एक से अधिक विवाह भी हो सकते हैं। दैनिक आमदनी की वृद्धि के लिए वह अनेक उपायों का आश्रय लेता है। वह धनी तथा सुखी जीवन बिताता है।
४५८ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनुलग्न : अष्टमभाव : राहु आठवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक के जीवन पर कई बार संकट आते हैं तथा मृत्यु-तुल्य स्थितियां बन जाती हैं। पेट में विकार रहता है। पुरातत्त्व की हानि होती है। ऐसा व्यक्ति परेशानियों से घिरा रहता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनुलग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में घोर संकट आते हैं। धर्म में उसकी आस्था नहीं होती। ऐसा व्यक्ति प्रायः अनीश्वरवादी होते हुए भी भाग्योन्नति के लिए अधिकाधिक परिश्रम करता तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनुलग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की पिता द्वारा परेशानी, राज्य द्वारा संकट तथा व्यवसाय में हानि का शिकार बनना पड़ता है। वह अपनी हिम्मत तथा गुप्त युक्तियों के बल पर आगे बढ़ने का प्रयत्न करता रहता है, परन्तु अधिक सफलता नहीं मिल पाती। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनुलग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में पर्याप्त वृद्धि होती है। कभी-कभी कठिनाइयां भी आती हैं, परन्तु वह अपना धैर्य नहीं छोड़ता और हिम्मत से काम लेकर कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर लेता है।
४५६ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनुलग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से भी कष्ट का अनुभव होता है। ऐसा व्यक्ति हिम्मती होने के कारण घबराता नहीं है तथा संकटों पर विजय पाने का प्रयत्न करता रहता है। 'धनु' लग्न में 'केतु' 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनुलग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की शारीरिक शक्ति एवं आकार में तो वृद्धि होती है, परन्तु शारीरिक सौन्दर्य में कमी भी अवश्य आती है। यह जिद्दी तथा हठी स्वभाव का होता है। ऐसा व्यक्ति सब कठिनाइयों का साहस के साथ मुकाबला करने वाला, परिश्रमी तथा धैर्यवान् होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनुलग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के कौटुम्बिक सुख में कमी रहती है तथा धन-संचय के लिए अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है। कभी-कभी उसे घोर आर्थिक संकटों में भी फंसना पड़ता है और प्रायः ऋण लेकर काम चलाना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती तथा धैर्यवान् होता है।
४६० 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में अत्य- धिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कमी तथा कष्ट का अनुभव होता है। ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों का आश्रय लेने वाला, साहसी तथा कठिन परिश्रमी होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को माता के सुख में बड़ी हानि उठानी पड़ती है तथा मातृभूमि का वियोग भी सहना पड़ता है। भूमि तथा भवन का सुख भी प्राप्त नहीं होता। परन्तु ऐसा व्यक्ति बड़ा परिश्रमी, साहसी, धैर्यवान् तथा सन्तोषी होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष में बड़ी हानि का सामना करना पड़ता है तथा विद्या- ध्ययन में भी बड़ी कठिनाइयों के बाद अल्प सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति घोर परिश्रमी, जिद्दी तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेने वाला होता है। वह सदैव चिन्तित भी बना रहता है।
४६१ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त करता है तथा झगड़े-मुकदमे आदि से भी वह लाभ उठाता है। महान संकट उपस्थित होने पर भी वह कभी हिम्मत नहीं हारता तथा बहादुरी के साथ मुकाबला करता हुआ उस पर विजय प्राप्त करता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित नीच के 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री- पक्ष में घोर हानि उठानी पड़ती है तथा दैनिक आमदनी के क्षेत्र में भी बड़ी कठिनाइयां आती रहती हैं। यह धैर्य तथा साहस के साथ गृहस्थ जीवन को सुखी बनाने का प्रयत्न करता रहता है, परन्तु सफलता थोड़ी ही मिलती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के जीवन पर बड़े-बड़े संकट आते हैं तथा उसे मृत्यु-तुल्य कष्टों का सामना करना पड़ता है। पेट में विकार भी रहता है। दैनिक जीवन में परेशानियां घनी रहती हैं। पुरातत्त्व की की हानि होती है। घोर परिश्रम करने पर भी सुख नहीं मिल पाता।
४६२ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : नवम भाव : केतु नवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में अत्यधिक बाधाएं आती हैं। उन्हें दूर करने के लिए वह अनेक गुप्त युक्तियों तथा परिश्रम का सहारा लेता है, परन्तु आंशिक सफलता ही मिल पाती है। धर्म तथा ईश्वर में उसकी आस्था कम होती है। सदैव चिन्ताओं तथा असफलताओं का शिकार बना रहता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को कुछ कमियों के साथ पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सामान्य लाभ, सफलता, सुख, यश, सहयोग तथा सम्मान की प्राप्ति होती है। अत्यधिक परिश्रम तथा युक्ति-बल का आश्रय लेने पर भी विशेष उन्नति नहीं हो पाती। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में अत्यधिक वृद्धि होती है। कभी-कभी संकटों का शिकार भी बनना पड़ता है, परन्तु उन पर वह अपनी गुप्त युक्तियों तथा कठोर परिश्रम के बल पर विजय प्राप्त कर लेता है। फिर भी पूर्ण सन्तोष नहीं मिल पाता। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : द्वादशभाव : केतु बारहवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है जिससे उसे बड़ी परेशानी तथा संकट उठाने पड़ते हैं। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भी परेशानियां मिलती हैं। वह गुप्त युक्तियों, परिश्रम, धैर्य तथा हिम्मत के बल पर कठिनाइयों को दूर करने का प्रयत्न करता है, परन्तु अधिक सफल नहीं हो पाता।
४६३ 'मकर' लग्न ['मकर' लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों के फलादेश का पृथक्-पृथक् वर्णन] 'मकर' लग्न का फलादेश 'मकर' लग्न में जन्म लेने वाले जातक का शरीर लम्बा होता है। वह बड़ी-बड़ी आँखों वाला, उग्र स्वभाव का, निरन्तर पुरुषार्थ करने वाला, लोभी, चतुर, वंचक, ठग, पाखण्डी, आलसी, मनमौजी, तमोगुणी तथा कफ-वायु से पीड़ित रहने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति भीरु, सन्तोषी, खर्चीला, लज्जा-रहित, धर्म के विरुद्ध आचरण करने वाला, अधिक सन्ततिवान्, कवियों तथा स्त्रियों में आसक्त भी होता है। 'मकर' लग्न वाला जातक अपनी प्रारम्भिक अवस्था में सुख भोगता है, मध्यमावस्था में दुःख पाता है तथा ३२ वर्ष की आयु के बाद अन्तिम समय तक सुखी बना रहता है। ऐसे व्यक्ति की आयु पूर्ण होती है तथा उसका भाग्योदय प्रायः ३२-३५ वर्ष की अवस्था में होता है।
४६४ 'मकर' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित- विभिन्न ग्रहों का स्थायी फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डलियों में संख्या ३३४ से ४४१ के बीच देखना चाहिए। गोचर कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए। ● 'मकर' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश १—'मकर' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०६७ से ११०८ के बीच देखना चाहिए। २—'मकर' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'सूर्य'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या १०६७ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या १०६८ (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या १०६९ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११०० (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११०१ (च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११०२ (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११०३ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११०४ (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११०५ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११०६ (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११०७ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११०८ 'मकर' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश १—'मकर' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'चन्द्रमा' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ११०९ से ११२० के बीच देखना चाहिए। २—'मकर' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध'
४६५ का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'चन्द्रमा'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११०९ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या १११० (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११११ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या १११२ (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या १११३ (च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या १११४ (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या १११५ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या १११६ (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या १११७ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या १११८ (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित तो हो संख्या १११६ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११२० 'मकर' लग्न में 'मंगल' का फलादेश १—'मगल' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मङ्गल' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ११२१ से ११३२ के बीच देखना चाहिए। २—'मंगल' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मङ्गल' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'मङ्गल'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११२१ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११२२ (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो यो संख्या ११२३ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११२४ (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११२५ (च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११२६ (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११२७ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११२८ (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११२६ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११३० (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११३१ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११३२
४६६ मकर 'कर्क' लग्न में 'बुध' का फलादेश १—'मकर' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ११३३ से ११४४ के बीच देखना चाहिए। २—'मकर' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में बुध— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ११३३ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ११३४ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ११३५ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ११३६ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ११३७ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ११३८ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ११३९ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ११४० (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ११४१ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ११४२ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ११४३ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ११४४ 'मकर' लग्न में 'गुरु' का फलादेश १—'मकर' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ११४५ से ११५६ के बीच देखना चाहिए। २—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'गुरु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ११४५ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ११४६ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ११४७ (ज) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ११४८ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ११४९ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ११५०
४६७ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ११५१ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ११५२ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ११५३ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ११५४ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ११५५ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ११५६ 'मकर' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश १—'मकर' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ११५७ से ११६८ के बीच देखना चाहिए। २—'मकर' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'शुक्र'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११५७ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११५८ (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११५६ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६० (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६१ (च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६२ (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६३ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६४ (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६५ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६६ (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६७ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६८ 'मकर' लग्न में 'शनि' का फलादेश १—'मकर' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ११६६ से ११८० के बीच देखना चाहिए। २—'मकर' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली विभिन्न भावों में स्थित 'शनि' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'शनि'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६६
४६८ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११७० (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११७१ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११७२ (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११७३ (च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११७४ (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११७५ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११७६ (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११७७ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११७८ (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११७९ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११८० 'मकर' लग्न में 'राहु' का फलादेश १—'मकर' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ११८१ से ११९२ के बीच देखना चाहिए। २—'मकर' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'राहु'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११८१ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११८२ (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११८३ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११८४ (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११८५ (च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११८६ (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११८७ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११८८ (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११८९ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११९० (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११९१ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११९२
४६६ 'मकर' लग्न में 'केतु' का फलादेश १—'मकर' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ११६३ से १२०४ के बीच देखना चाहिए। २—'मकर' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६३ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६४ (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६५ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६६ (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६७ (च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६८ (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६६ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या १२०० (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या १२०१ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या १२०२ (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या १२०३ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या १२०४ ● 'मकर' लग्न में 'सूर्य' 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मकर लग्न : प्रथमभाव : सूर्य पहले भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी आती है तथा कभी-कभी विशेष शारीरिक कष्टों का सामना भी करना पड़ता है, परन्तु आयु एवं पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री के पक्ष में सामान्य कठिनाई रहती है तथा दैनिक व्यवसाय में भी कुछ परेशानियां आती रहती हैं।
कुण्डली विवरण (मकर लग्न, प्रथम भाव : सूर्य):
- भाव १ (लग्न): १० (मकर), सूर्य
- भाव २: ११ (कुम्भ)
- भाव ३: १२ (मीन)
- भाव ४: १ (मेष)
- भाव ५: २ (वृषभ)
- भाव ६: ३ (मिथुन)
- भाव ७: ४ (कर्क)
- भाव ८: ५ (सिंह)
- भाव ९: ६ (कन्या)
- भाव १०: ७ (तुला)
- भाव ११: ८ (वृश्चिक)
- भाव १२: ९ (धनु) (कुण्डली संख्या: १०६५)
४७० 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मकर लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक धन का संचय नहीं कर पाता । तथा कुटुम्ब के सुख में भी संकट आते रहते हैं । सातवीं दृष्टि से स्वराशि में अष्टमभाव को देखने से आयु की वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है । ऐसा व्यक्ति अमीरी ढंग का जीवन बिताता तथा शान-शौकत में खर्च करता रहता है । 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मकर लग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कमी आती है । आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति का लाभ होता है । सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्योन्नति में कुछ रुकावटें आती हैं तथा धर्म के पक्ष में भी कमी बनी रहती है । 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मकर लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित उच्च के 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता है । आयु तथा पुरातत्त्व का भी लाभ होता है । दैनिक जीवन अमीरी ढंग का रहता है । सातवीं नीच-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता से सुख में कमी आती है तथा राज्य एवं व्यवसाय की उन्नति में रुकावटें आती हैं ।