भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५४ 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का भी लाभ होता है। दैनिक सुख, धन-संचय तथा भाई-बहिन के सुख में कमी रहती है। तीसरी मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को देखने से धन-कुटुम्ब का सामान्य सुख मिलता है। दसवीं [चित्र: कुण्डली १०६७] नीच-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के पक्ष में कमी बनी रहती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : नवमभाव : शनि नवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को भाग्योन्नति एवं धर्म- पालन में बाधाएं आती हैं। धन-कुटुम्ब का सामान्य- सुख मिलता है। तीसरी मित्र तथा उच्च-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी खूब रहती है तथा कभी-कभी आकस्मिक धन-लाभ भी होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि [चित्र: कुण्डली १०६८] होती है। दसवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है तथा झगड़े-झंझटों से लाभ होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : दशमभाव : शनि दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को पिता से सहयोग, राज्य से सम्मान तथा व्यवसाय से लाभ मिलता है। भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। तीसरी शत्रु- दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्ध भी असन्तोषजनक रहते हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से [चित्र: कुण्डली १०६९] माता, भूमि एवं भवन के सुख में कमी रहती है। दसवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री-पक्ष से सुख तथा दैनिक व्यवसाय में सफलता की प्राप्ति होती है।