भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 446, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 446

४५५ 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आमदनी में विशेष वृद्धि होती है। कभी-कभी आकस्मिक धन-लाभ भी होता है। कुटुम्ब तथा भाई-बहिनों के सुख एवं पराक्रम में भी वृद्धि होती है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी आती है। सातवीं नीच तथा शत्रु-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान से कष्ट मिलता है तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में कमी रहती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है परन्तु दैनिक जीवन में परेशानियों का अनुभव होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों का संबंध भी असन्तोषजनक रहता है। धन-कुटुम्ब तथा भाई-बहिन के सुख में भी कमी रहती है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में तीसरे भाव को देखने से धन-कुटुम्ब का सामान्य सुख प्राप्त होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु- पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है तथा गुप्त युक्तियों के सहारे लाभ भी मिलता है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्योन्नति में कठिनाइयां आती हैं तथा धर्म का पालन भी पूर्ण रूप से नहीं हो पाता। 'धनु' लग्न में 'राहु' 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनु लग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कमी आती है। कभी-कभी कठिन शारीरिक कष्ट भी उठाना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति देखने में सज्जन परन्तु भीतर से चालाक होता है।