भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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४६० 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में अत्य- धिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कमी तथा कष्ट का अनुभव होता है। ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों का आश्रय लेने वाला, साहसी तथा कठिन परिश्रमी होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को माता के सुख में बड़ी हानि उठानी पड़ती है तथा मातृभूमि का वियोग भी सहना पड़ता है। भूमि तथा भवन का सुख भी प्राप्त नहीं होता। परन्तु ऐसा व्यक्ति बड़ा परिश्रमी, साहसी, धैर्यवान् तथा सन्तोषी होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष में बड़ी हानि का सामना करना पड़ता है तथा विद्या- ध्ययन में भी बड़ी कठिनाइयों के बाद अल्प सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति घोर परिश्रमी, जिद्दी तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेने वाला होता है। वह सदैव चिन्तित भी बना रहता है।