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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 638 में से

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४६१ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त करता है तथा झगड़े-मुकदमे आदि से भी वह लाभ उठाता है। महान संकट उपस्थित होने पर भी वह कभी हिम्मत नहीं हारता तथा बहादुरी के साथ मुकाबला करता हुआ उस पर विजय प्राप्त करता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित नीच के 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री- पक्ष में घोर हानि उठानी पड़ती है तथा दैनिक आमदनी के क्षेत्र में भी बड़ी कठिनाइयां आती रहती हैं। यह धैर्य तथा साहस के साथ गृहस्थ जीवन को सुखी बनाने का प्रयत्न करता रहता है, परन्तु सफलता थोड़ी ही मिलती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के जीवन पर बड़े-बड़े संकट आते हैं तथा उसे मृत्यु-तुल्य कष्टों का सामना करना पड़ता है। पेट में विकार भी रहता है। दैनिक जीवन में परेशानियां घनी रहती हैं। पुरातत्त्व की की हानि होती है। घोर परिश्रम करने पर भी सुख नहीं मिल पाता।

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