भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 453

४६२ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : नवम भाव : केतु नवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में अत्यधिक बाधाएं आती हैं। उन्हें दूर करने के लिए वह अनेक गुप्त युक्तियों तथा परिश्रम का सहारा लेता है, परन्तु आंशिक सफलता ही मिल पाती है। धर्म तथा ईश्वर में उसकी आस्था कम होती है। सदैव चिन्ताओं तथा असफलताओं का शिकार बना रहता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को कुछ कमियों के साथ पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सामान्य लाभ, सफलता, सुख, यश, सहयोग तथा सम्मान की प्राप्ति होती है। अत्यधिक परिश्रम तथा युक्ति-बल का आश्रय लेने पर भी विशेष उन्नति नहीं हो पाती। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में अत्यधिक वृद्धि होती है। कभी-कभी संकटों का शिकार भी बनना पड़ता है, परन्तु उन पर वह अपनी गुप्त युक्तियों तथा कठोर परिश्रम के बल पर विजय प्राप्त कर लेता है। फिर भी पूर्ण सन्तोष नहीं मिल पाता। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनु लग्न : द्वादशभाव : केतु बारहवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है जिससे उसे बड़ी परेशानी तथा संकट उठाने पड़ते हैं। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भी परेशानियां मिलती हैं। वह गुप्त युक्तियों, परिश्रम, धैर्य तथा हिम्मत के बल पर कठिनाइयों को दूर करने का प्रयत्न करता है, परन्तु अधिक सफल नहीं हो पाता।