भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५६ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनुलग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से भी कष्ट का अनुभव होता है। ऐसा व्यक्ति हिम्मती होने के कारण घबराता नहीं है तथा संकटों पर विजय पाने का प्रयत्न करता रहता है। 'धनु' लग्न में 'केतु' 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनुलग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की शारीरिक शक्ति एवं आकार में तो वृद्धि होती है, परन्तु शारीरिक सौन्दर्य में कमी भी अवश्य आती है। यह जिद्दी तथा हठी स्वभाव का होता है। ऐसा व्यक्ति सब कठिनाइयों का साहस के साथ मुकाबला करने वाला, परिश्रमी तथा धैर्यवान् होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश धनुलग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के कौटुम्बिक सुख में कमी रहती है तथा धन-संचय के लिए अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है। कभी-कभी उसे घोर आर्थिक संकटों में भी फंसना पड़ता है और प्रायः ऋण लेकर काम चलाना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती तथा धैर्यवान् होता है।