भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५८ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनुलग्न : अष्टमभाव : राहु आठवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक के जीवन पर कई बार संकट आते हैं तथा मृत्यु-तुल्य स्थितियां बन जाती हैं। पेट में विकार रहता है। पुरातत्त्व की हानि होती है। ऐसा व्यक्ति परेशानियों से घिरा रहता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनुलग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में घोर संकट आते हैं। धर्म में उसकी आस्था नहीं होती। ऐसा व्यक्ति प्रायः अनीश्वरवादी होते हुए भी भाग्योन्नति के लिए अधिकाधिक परिश्रम करता तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनुलग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की पिता द्वारा परेशानी, राज्य द्वारा संकट तथा व्यवसाय में हानि का शिकार बनना पड़ता है। वह अपनी हिम्मत तथा गुप्त युक्तियों के बल पर आगे बढ़ने का प्रयत्न करता रहता है, परन्तु अधिक सफलता नहीं मिल पाती। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश धनुलग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में पर्याप्त वृद्धि होती है। कभी-कभी कठिनाइयां भी आती हैं, परन्तु वह अपना धैर्य नहीं छोड़ता और हिम्मत से काम लेकर कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर लेता है।