भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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४७१ 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मकरलग्न : पंचमभाव : सूर्य पांचवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा विद्याध्ययन में कठिनाई रहती है। बुद्धि भी कम- जोर रहती है। ऐसा व्यक्ति चिन्तातुर तथा स्वभाव का क्रोधी होता है। उसे आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से लाभ-प्राप्ति के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है तभी सफलता मिल पाती है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मकरलग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर हमेशा विजय प्राप्त करता है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में असन्तोष भी रहता है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मकरलग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा कभी-कभी बहुत हानि भी उठानी पड़ती है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कुछ कमी रहती है तथा कभी-कभी शिकार भी बनना पड़ता है।