भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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४७२ 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मकरलग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में स्वराशि में स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व की विशेष शक्ति प्राप्त होता है। वह बड़ा स्वाभिमानी, तेजस्वी, निडर तथा बहादुर होता है। उसका दैनिक जीवन भी बड़ा प्रभाव- पूर्ण रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन संचय में परेशानी रहती है तथा कौटुम्बिक सुख में बाधाएँ आती हैं। ११०४ 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मकरलग्न : नवमभाव : सूर्य नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति कुछ रुकावटों के साथ होती है। धर्म-पालन में भी थोड़ी त्रुटि रहती है तथा यश में भी कमी आती है। आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। जिससे जातक रईसी ढंग का जीवन व्यतीत करता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम की समुचित वृद्धि नहीं हो पाती। ११०५ 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मकरलग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की तुला राशि पर स्थित नीच के 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को पिता पक्ष से घोर कष्ट उठाना पड़ता है। राज्य पक्ष से प्रतिष्ठा में कमी तथा व्यवसाय-पक्ष में बाधाओं का का सामना करना पड़ता है। आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति को भी कुछ हानि होती है। सातवीं मित्र तथा उच्च-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सामान्य सुख प्राप्त होता है। ११०६