भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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४७६ 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मकरलग्न : पंचमभाव : मंगल पाँचवें भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को विद्या-वृद्धि तथा सन्तान-सुख का लाभ होता है। माता, भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। चौथी मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु एवं पुरातत्व की शक्ति में वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में एकादशभाव को देखने से आमदनी अच्छी रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ प्राप्त होता है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मकरलग्न : षष्ठभाव : मंगल छठे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर विशेष प्रभाव रखता है तथा झगड़ों से लाभ उठाता है। माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी आती है तथा आमदनी के मार्ग में कठिनाइयाँ आती रहती हैं। चौथी मित्र- दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। आठवीं उच्च दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य स्वास्थ्य, एवं प्रभाव में वृद्धि होती है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मकरलग्न : सप्तमभाव : मंगल सातवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित नीच के 'मंगल' के प्रभाव से जातक की स्त्री- पक्ष तथा गृहस्थी के सुख में कमी रहती है। व्यवसाय माता, भूमि तथा भवन का सुख भी कमजोर रहता है। चौथी शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ होता है। सातवीं उच्च-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव एवं गौरव की वृद्धि होती है। आठवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से धन-संचय में कठिनाइयाँ आती हैं तथा कुटुम्ब का सामान्य सुख प्राप्त होता है।