भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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४८६ 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मकरलग्न : द्वितीयभाव : गुरु दूसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित व्ययेश गुरु के प्रभाव से जातक के धन-संग्रह में कमी आती है तथा कुटुम्ब से भी परेशानी रहती है । खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है । पाँचवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष में बुद्धिमानी से काम निकलता है । सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का कुछ लाभ मिलता है । नवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सामान्य सफलताएँ मिलती हैं । 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मकरलग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में स्वराशि-स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों का सुख मिलता है, परन्तु पुरुषार्थ में कमी आती है। खर्च ठीक से चलता है । बाहरी स्थानों से लाभ होता है। पांचवी उच्च तथा मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से सुन्दर स्त्री मिलती है तथा दैनिक व्यवसाय में सफलता प्राप्त होती है । सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में उतार-चढ़ाव आते हैं । नवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी श्रेष्ठ रहती है । ऐसा व्यक्ति सुखी जीवन बिताता है ! 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मकरलग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं भवन में सुख में तथा भाई-बहिन के सुख में भी कुछ कमी रहती है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व का सामान्य लाभ होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कमी के साथ सफलता मिलती है । नवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से घर-बैठे ही लाभ प्राप्त होता है ।