भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 476, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 476

४८५ 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मकरलग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की आमदनी में अत्यधिक वृद्धि होती है तथा शत्रु-पक्ष में सफलता मिलती है। विवेक तथा परिश्रम द्वारा भाग्य की विशेष उन्नति होती है। स्वार्थयुक्त धर्म का पालन भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान-पक्ष में कुछ परेशानियों के साथ सफलता मिलती है, परन्तु विद्या-बुद्धि की विशेष उन्नति होती है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मकरलग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, परन्तु उसकी पूर्ति बिना किसी कठिनाई के होती रहती है। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। भाग्यो- न्नति में कठिनाइयाँ आती हैं तथा यश की कमी रहती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष से कुछ कठिनाई होती है, परन्तु भाग्य-बल से वह उन पर विजय भी पा लेता है। 'मकर' लग्न में 'गुरु' 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मकरलग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित नीच के 'बुध' के प्रभाव से जातक का शरीर दुर्बल रहता है। भाई-बहिन के सुख में कमी आती है एवं पराक्रम भी अल्प रहता है। खर्च चलाने में कठिनाई होती है तथा बाहरी स्थानों का सम्बन्ध भी असंतोष- जनक रहता है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है तथा सन्तान-पक्ष से सुख-दुःख दोनों ही मिलते हैं। सातवीं उच्च-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। नवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति में न्यूनाधिकता होती रहती है।