भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८८ 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मकरलग्न : अष्टमभाव : गुरु आठवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्त्व की कुछ हानि होती है। पाँचवी दृष्टि से स्वराशि में द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक होता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख में कुछ कमी रहती है। नवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन के सुख में कुछ त्रुटिपूर्ण सफलता प्राप्त होती है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मकरलग्न : नवमभाव : बुध नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म के पक्ष में कमजोरी रहती है। बाहरी सम्बन्धों से कुछ लाभ होता है जिससे खर्च चलता रहता है। पाँचवीं नीच-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी रहती है। मन भी अशान्त रहता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में सामान्य वृद्धि होती है। नवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष में स्व-विवेक-बुद्धि से सफलता मिलती है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मकरलग्न : दशमभाव : गुरु दसवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशिपर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कमी रहती है। भाई-बहिनों के सुख तथा परा- क्रम में वृद्धि होती है, जिसके कारण खर्च अच्छी तरह चलता है। बाहरी स्थानों से लाभ होता रहता है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन-संचय तथा कौटुम्बिक सुख में कठिनाइयाँ आती हैं। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता के सुख में कमी रहती है, परन्तु भूमि तथा भवन का सुख खर्च के बल पर मिलता है। नवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर बुद्धिमानी से प्रभाव स्थापित होता है।