भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८६ 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मकरलग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी रहती है। बाहरी सम्बन्धों से भी लाभ होता है, अतः खर्च आराम से चलता है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान-पक्ष में असन्तोष रहता है, परन्तु विद्या-बुद्धि की वृद्धि होती है। नवीं उच्च-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री का सुख मिलता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। 'मकर' लग्न को कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मकरलग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में स्वराशि-स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्धों से लाभ मिलता रहता है। भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में कमी रहती है। पाँचवीं मित्र- दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सामान्य सुख मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर युक्तिपूर्वक प्रभाव स्थापित होता है। नवीं मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ कुछ कमी के साथ होता है। परन्तु ऐसा व्यक्ति शानदार खर्च करता तथा समाज में प्रभाव- शाली बना रहता है। 'मकर' लग्न में 'शुक्र' 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मकरलग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में मित्र शनि की राशि-पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव एवं सम्मान की प्राप्ति होती है। पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्रों में भी सफलता मिलती है। समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। सन्तान से सुख मिलता है तथा विद्या-बुद्धि का श्रेष्ठ लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से पत्नी सुन्दर तथा योग्य मिलती है तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी लाभ होता रहता है।