भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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५३ उच्चराशिस्थ 'राहु' उच्चराशिस्थ 'राहु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'राहु' उच्च (मिथुन, मतान्तर से वृष) राशि का हो, वह धनी, साहसी, लम्पट, सरदार, शूर-वीर, गुप्त- स्वभाव वाला, दुष्ट, क्रूर, राजा द्वारा सम्मान प्राप्त करने वाला, प्रतापी तथा धैर्यवान होता है। उच्चराशिस्थ 'केतु' उच्चराशिस्थ 'केतु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' उच्च (धनु, मतान्तर से वृश्चिक) राशि का हो वह भ्रमण-प्रिय, सरदार, नीच प्रकृति वाला, सुखी, अधिकार सम्पन्न व मिथ्यावादी, नीच तथा वृद्धों जैसा आचरण करने वाला होता है। टिप्पणी— किसी ग्रह का केवल उच्च होना ही पूर्ण फलदायक नहीं होता, उसके साथ ही अन्य विषयों पर भी विचार करके निष्कर्ष निकालना चाहिए। मूलत्रिकोणस्थ ग्रहों का फलादेश मूल त्रिकोणस्थ ग्रहों का संक्षिप्त विशिष्ट फलादेश निम्नानुसार समझना चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण कुण्डलियाँ मेष लग्न की हैं। अन्य लग्नों की कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। मूलत्रिकोणस्थ 'सूर्य' मूल त्रिकोणस्थ 'सूर्य' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'सूर्य' मूल त्रिकोणस्थ (सिंह राशि के २० अंश तक) हो, वह सम्मानित, पूज्य, यशस्वी, सुखी, धनी तथा सब कार्यों में कुशल होता है।