भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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४६४ 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मकर लग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को धन-संचय एवं कौटुम्बिक सुख का यथेष्ट लाभ होता है। तीसरी नीच-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन के सुख में कमी रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की कुछ हानि होती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से एकादश भाव को देखने से कुछ कठिना- इयों के साथ आमदनी में वृद्धि होती है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मकर लग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को कुछ कठिनाई के साथ भाई-बहिन का सुख मिलता है तथा पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि होती है। पुरुषार्थ के बल पर धन तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है। तीसरी मित्रदृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों से कुछ कठिनाई के साथ लाभ मिलता है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मकर लग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित नीच के 'शनि' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है। शारीरिक सौन्दर्य एवं धन-कुटुम्ब का सुख भी कम ही मिलता है। तीसरी मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है तथा झगड़ों से लाभ होता है। सातवीं उच्चदृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में प्रथमभाव को देखने से शरीर सुन्दर होता है तथा आत्मबल की अधिकता पाई जाती है।