भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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४६५ 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मकर लग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की सन्तान, विद्या तथा बुद्धि का विशेष लाभ होता है। शारीरिक सौन्दर्य, वाणी तथा योग्यता की भी प्राप्ति होती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री से कुछ असंतोष रहते हुए भी उसमें अधिक अनुरक्ति होती है तथा व्यवसाय-पक्ष में भी कुछ त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है। ११८३ सातवीं शत्रुदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में कठिनाइयाँ आती हैं। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख में वृद्धि होती है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मकर लग्न : षष्ठभाव : शनि छठे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कुछ कमी रहती है। शत्रु-पक्ष पर प्रभाव बढ़ता है। कुटुम्ब से सामान्य विरोध रहता है तथा धन-संग्रह में कमी आती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का अधिक लाभ नहीं होता। ११८४ सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों से सम्बन्ध बनता है। दसवीं शत्रुदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों से कुछ वैमनस्य रहता है, परन्तु पराक्रम की वृद्धि होती है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मकर लग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से शक्ति एवं आत्मीयता मिलती है तथा परिश्रम के द्वारा व्यवसाय में उन्नति होती है। धन तथा सन्तान का सुख भी मिलता है। तीसरी मित्रदृष्टि से नवम भाव को देखने से जातक के भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। ११८५ सातवीं दृष्टि से स्वराशि में प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में वृद्धि होती है तथा स्वाभिमान एवं प्रभाव का लाभ होता है। दसवीं नीच तथा शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमितथा भवन के सुख में कमी रहती है।