भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६८ 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मकर लग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक धन तथा कुटुम्ब के कारण चिन्तित रहता है तथा कष्ट भोगता है। कभी-कभी ऋण भी लेना पड़ता है। प्रकट रूप से वह धनी समझा जाता है, परन्तु यथार्थ में धन की कमी रहती है। बाद में गुप्त युक्तियों के बल पर वह अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ भी बना लेता है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मकर लग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों की ओर से कष्ट मिलता है, परन्तु पराक्रम की अत्यधिक वृद्धि होती है। भीतर से दुर्बलता अनुभव करने पर भी वह प्रकट रूप में बड़ा हिम्मती होता है तथा कठिनाइयों पर विजय पाता रहता है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मकर लग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है। कभी मातृभूमि का त्याग भी करना पड़ता है। अन्त में वह गुप्त युक्तियों के बल पर सुख तथा प्रभाव की वृद्धि करता है। ऐसा व्यक्ति हिम्मती तथा धैर्यवान् होता है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मकर लग्न : पंचमभाव : राहु पाँचवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से कष्ट होता है तथा विद्या ग्रहण करने में भी कठिनाई आती है। परन्तु उसकी बुद्धि बड़ी तीव्र होती है। वह होशियार तथा गुप्त युक्तियों में प्रवीण होता है। अन्त में, सन्तान तथा विद्या दोनों ही क्षेत्रों में सफलता भी पा लेता है।