भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 502, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें५११ 'कुम्भ' लग्न में 'केतु' का फलादेश १—'कुम्भ' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३०२ से १३१३ के बीच देखना चाहिए। २—'कुम्भ' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३०२ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३०३ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३०४ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३०५ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३०६ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३०७ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३०८ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३०६ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३१० (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३११ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३१२ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३१३ 'कुम्भ' लग्न में 'सूर्य' 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कुम्भलग्न : प्रथमभाव : सूर्य पहले भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कुछ कमी आती है, परन्तु प्रभाव एवं शक्ति की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति तेज स्वभाव का तथा बहुत दौड़-धूप करने वाला है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में सप्तमभाव को देखने से स्त्री-पक्ष द्वारा विशेष सुख मिलता है तथा पुरुषार्थ द्वारा दैनिक आमदनी के क्षेत्र में भी सफलता मिलती रहती है। गार्हस्थ्य जीवन आनन्दमय बना रहता है।