भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 504, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें५१३ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कुम्भ लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं संतान के क्षेत्र में सफलता मिलती है। स्त्री तथा व्यवसाय से भी सुख मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से बुद्धियोग द्वारा आमदनी अच्छी रहती है। ऐसा व्यक्ति सुखी, धनी तथा प्रभावशाली होता है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कुम्भ लग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर विजय पाता है तथा झगड़ों के मामलों से लाभ उठाता है। व्यवसाय में कुछ कठिनाई के साथ सफलता मिलती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कुम्भ लग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में स्वराशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को स्त्री का पर्याप्त सुख मिलता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। ससुराल से लाभ होता है तथा गृहस्थ जीवन सुखमय बना रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी रहती है।