भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१४ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कुम्भ लग्न : अष्टमभाव : सूर्य [चित्र १२८३ : कुम्भ लग्न, अष्टम भाव (कन्या राशि) में सूर्य] आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्त्व- शक्ति में वृद्धि होती है। स्त्री-पक्ष से परेशानी तथा व्यवसाय में कठिनाइयां भी रहती हैं। बाहरी सम्बन्धों से कुछ लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से कठिन परिश्रम द्वारा धन का संचय होता है तथा कौटुम्बिक सुख भी प्राप्त होता है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कुम्भ लग्न : नवमभाव : सूर्य [चित्र १२८४ : कुम्भ लग्न, नवम भाव (तुला राशि) में सूर्य] नवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित नीच के 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म में कुछ कमी आती है। स्त्री तथा व्यवसाय-पक्ष में भी कठिनाइयां रहती हैं। वह स्वार्थ-सिद्धि के लिए उचित- अनुचित का विचार भी नहीं करता। सातवीं मित्र तथा उच्च-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में विशेष वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, पराक्रमी तथा धैर्यवान् होता है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कुम्भ लग्न : दशमभाव : सूर्य [चित्र १२८५ : कुम्भ लग्न, दशम भाव (वृश्चिक राशि) में सूर्य] दसवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय-पक्ष से लाभ होता है। स्त्री-पक्ष से भी श्रेष्ठ शक्ति मिलती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने माता, भूमि एवं भवन के सुख में कमी रहती है।