भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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५१५ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कुम्भ लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को व्यवसाय द्वारा अच्छी आमदनी होती है तथा स्त्री-पक्ष से विशेष लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के पक्ष में भी विशेष उन्नति होती है तथा सुख मिलता है। १२२६ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कुम्भ लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को खर्च अधिक रहने के कारण कठिनाई उठानी पड़ती है। बाहरी संबंधों से लाभ तथा स्थानीय व्यवसाय से हानि की प्राप्ति होती है। स्त्री-सुख में भी बहुत कमी आती है। सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है तथा झगड़े के मामलों से लाभ होता है १२२७ 'कुम्भ' लग्न में 'चन्द्रमा' 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कुम्भ लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक का शरीर अस्वस्थ तथा मन चिन्तित रहता है, परन्तु वह शत्रुओं पर प्रभाव डालने तथा झगड़ों में विजय पाने में सफल रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री से कुछ मतभेद रहता है तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी चिन्ताएँ तथा कठिनाइयां बनी रहती हैं। १२२८