भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 507, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 507

५१६ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कुम्भ लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक परिश्रमपूर्वक धन का संचय करता है तथा कौटुम्बिक सुख की वृद्धि भी होती है। शत्रु-पक्ष से परेशानी रहने पर भी झगड़े के मामलों से लाभ उठाता है। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के सम्बन्ध में कुछ परेशानी रहती है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कुम्भ लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक के मनोबल तथा पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से कुछ मतभेद भी रहता है। सातवीं सामान्य मित्रदृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्योन्नति तथा धर्म के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के बाद वृद्धि होती है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कुम्भ लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित उच्च के चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं भवन का सुख प्राप्त होता है। शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है तथा झगड़े के मामलों से लाभ भी उठाता है। सातवीं मित्र तथा नीचदृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं।