भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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५१७ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कुम्भ लग्न : पंचमभाव : चन्द्र पाँचवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है तथा शत्रु-पक्ष पर प्रभाव बना रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादश भाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ आमदनी की वृद्धि होती है तथा गुप्त युक्तियों के बल पर लाभ उठाता है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कुम्भ लग्न : षष्ठभाव : चन्द्र छठे भाव में स्वराशि-स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर अत्यधिक प्रभाव रखता है तथा झगड़े के मामलों में सफलता भी प्राप्त करता है, परन्तु मन में चिन्ताएँ भी रहती हैं। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च में कठिनाई रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों से भी परेशानी मिलती है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कुम्भ लग्न : सप्तमभाव : चन्द्र सातवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष में रोग आदि की परेशानी रहती है। व्यवसाय-क्षेत्र में कठिनाइयों के बाद ही सफलता मिलती है। शत्रु-पक्ष पर भी प्रभाव रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शरीर रोगों एवं चिन्ताओं का शिकार रहता है। फिर भी मनोबल में वृद्धि होती है।