भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१८ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कुम्भलग्न : अष्टमभाव : चन्द्र आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व पक्ष में कठिनाई आती है । शत्रु-पक्ष पर भी बड़ी कठिनाइयों के बाद प्रभाव स्थापित होता है। हर समय चिन्ताएँ लगी रहती हैं । ननसाल-पक्ष कमजोर होता है । सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि के लिए जातक को विशेष परिश्रम करना पड़ता है । 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कुम्भलग्न : नवमभाव : चन्द्र नवें भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से भाग्य एवं धर्म की उन्नति में कुछ कठिनाइयाँ आती हैं तथा यश में भी लगी रहती है । शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है तथा झगड़ों से लाभ होता है । सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिन के सुख में कुछ कठिनाइयाँ आती हैं, परन्तु पराक्रम की विशेष वृद्धि होती है । 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कुम्भलग्न : दशमभाव : चन्द्र दसवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित नीच के 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं । शत्रु-पक्ष से भी बहुत परेशानी रहती है । सातवीं उच्च-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सामान्य जातक को सुख प्राप्त होता है।