भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१६ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कुम्भलग्न : एकादशभाव : चन्द्र ग्यारहवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक अपने मनोबल एवं शारीरिक परिश्रम द्वारा आमदनी को बढ़ाता है। शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रखता है तथा झगड़ों से लाभ उठाता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या-बुद्धि का यथेष्ट लाभ होता है एवं परन्तु सन्तान-पक्ष से कुछ चिन्ता बनी रहती है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कुम्भलग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को अपना खर्च चलाने में कठिनाई रहती है। बाहरी सम्बन्धों से भी परेशानी होती है। शत्रु-पक्ष से मानसिक चिन्ताएँ रहती हैं। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर विनम्र तरीके से प्रभाव स्थापित करता है तथा सफलता पाता है। 'कुम्भ' लग्न में 'मंगल' 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कुम्भलग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व की प्राप्ति होती है। भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम की वृद्धि भी होती है। चौथी सामान्य मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख मिलता है। आठवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय-पक्ष से सुख मिलता है। सातवीं मित्र- दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है।