भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 515, कुल 638 में से

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५२४ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कुम्भ लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित नीच के 'बुध' के प्रभाव से जातक धन-संचय नहीं कर पाता तथा कुटुम्ब से भी विरोध रहता है। विद्या तथा सन्तान-पक्ष कमजोर रहता है। सातवीं उच्च-दृष्टि से स्वराशि में अष्टम भाव में देखने से आयु की श्रेष्ठ शक्ति प्राप्त होती है, परन्तु पुरातत्त्व का लाभ अधूरा रहता है। ऐसा व्यक्ति अपने विवेक तथा विद्या-बुद्धि के बल से लाभ एवं सम्मान प्राप्त करता रहता है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कुम्भ लग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों से कष्ट मिलता है तथा सन्तान से परेशानी रहती है। पराक्रम, विद्या तथा बुद्धि का कुछ कठिनाइयों के साथ लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। ऐसे व्यक्ति को सफलता पाने के लिए हर-क्षेत्र में संघर्ष करना पड़ता है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कुम्भलग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को कुछ कठिनाइयों के साथ भूमि, भवन का सुख प्राप्त होता है तथा माता के सुख में कमी रहती है। सन्तान-पक्ष से सुख मिलता है तथा विद्या, आयु एवं पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता के कारण कुछ परेशानी होती है, परन्तु राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में उन्नति प्राप्त होती है।

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