भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२५ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कुम्भलग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में स्वराशि-स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को कुछ कठिनाइयों के साथ सन्तान-पक्ष से सुख मिलता है तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में श्रेष्ठ लाभ होता है। यह बुद्धिमान्, विवेकी तथा वाणी का धनी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से विवेक-बुद्धि द्वारा आमदनी के क्षेत्र में विशेष सफ- लताएँ मिलती हैं। १२४६ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' [बुध] का फलादेश कुम्भलग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष से अशान्ति मिलती है तथा विवेक-बुद्धि द्वारा झगड़े के मामलों में सफलता प्राप्त हो पाती है। विद्या, सन्तान, आयु तथा पुरातत्त्व के पक्ष की कमजोर पहलू हैं। परेशानियां भी उठानी पड़ती हैं। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। १२४७ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कुम्भलग्न : सप्तमभाव : बुध सातवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को कुछ कठिनाइयों के बाद स्त्री तथा व्यवसाय-पक्ष में सफलता मिलती है। विद्या- बुद्धि, आयु तथा पुरातत्त्व शक्ति का भी लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से कुछ शारीरिक परेशानियां तो रहती हैं, परन्तु प्रभाव एवं सम्मान की वृद्धि होती है। १२४८