भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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पृष्ठ 519, कुल 638 में से

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५२८ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कुम्भ लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में स्वराशि-स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का पर्याप्त सुख मिलता है। पाँचवीं मित्र तथा उच्च-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है। झगड़े के मामलों से लाभ मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। नवीं मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने से राज्य, पिता, व्यवसाय के क्षेत्र में पर्याप्त सफलता मिलती है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कुम्भ लग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है तथा धन एवं कौटुम्बिक सुख का पर्याप्त लाभ होता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री सुन्दर मिलती है तथा दैनिक व्यवसाय में लाभ होता रहता है। ससुराल से भी लाभ होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से नवम भाव को देखने से कुछ रुकावटों के साथ भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में एकादश भाव को देखने से आमदनी बहुत अच्छी रहती है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कुम्भ लग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में सामान्य शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को माता के सुख में कमी रहती है, परन्तु माता से लाभ भी होता है। भूमि तथा भवन का अच्छा सुख मिलता है। धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि होती है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व में वृद्धि होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं। नवीं नीचदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से उसका खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से भी परेशानी होती है।

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