भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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५२६ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कुम्भ लग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का यथेष्ट लाभ होता है। धन तथा कुटुम्ब का सुख भी पर्याप्त मिलता है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से नवम भाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में एकादशभाव को देखने से धन की आमदनी अच्छी रहती है। नवीं शत्रु- दृष्टि में प्रथम भाव को देखने से शारीरिक प्रभाव में वृद्धि होती है तथा यश, मान एवं प्रभाव की प्राप्ति होती है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कुम्भ लग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर बहुत प्रभाव रखता है तथा झगड़ों से लाभ उठाता है। ननसाल-पक्ष उन्नत होता है। कुटुम्ब से कुछ संकट रहता है तथा धन-संचय में भी कुछ कठिनाइयां आती हैं। पाँचवीं मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय से पर्याप्त लाभ होता है। सातवीं नीचदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक होता है तथा बाहरी सम्बन्धों से परेशानी रहती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में तृतीयभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि होती है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कुम्भ लग्न : सप्तमभाव : बुध सातवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को सुन्दर स्त्री मिलती है तथा स्त्री-पक्ष से धन एवं सुख की प्राप्ति होती है। व्यवसाय से खूब लाभ होता है। धन तथा कुटुम्ब का सुख बना रहता है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में एकादश भाव को देखने से आमदनी खूब रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी रहती है, परन्तु सम्मान एवं प्रभाव की वृद्धि होती है। नवीं मित्रदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम बढ़ता है तथा भाई-बहिन के सुख में भी वृद्धि होती है।

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