भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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५३४ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भलग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित नीच के शुक्र के प्रभाव से जातक के जीवन में अशान्ति रहती हैं। आयु तथा पुरातत्त्व के सुख में कमी आती हैं। भूमि, भवन तथा माता के सुख में भी बड़ी कमजोरी रहती हैं। सातवीं उच्च तथा सामान्य मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख की परिश्रम द्वारा उन्नति होती है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भलग्न : नवमभाव : शुक्र नवमें भाव में स्वराशि स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के भाग्य की अत्यधिक वृद्धि होती है तथा धर्म का पालन भी यथाविधि होता है। माता, भूमि तथा भवन का सुख भी पर्याप्त मिलता है। सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख भी श्रेष्ठ रहता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भलग्न : दशमभाव : शुक्र दसवें भाव में सामान्य मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में पर्याप्त सफलताएँ मिलती हैं। यह धर्मात्मा, यशस्वी तथा प्रतिष्ठित भी होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का यथेष्ट सुख प्राप्त होता है।