भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३५ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भलग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में सामान्य मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की आम- दनी में यथेष्ट वृद्धि होती है। यह धनी, न्यायी, चतुर, धार्मिक तथा यशस्वी भी होता है एवं माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख भी मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान-पक्ष से भी सुख मिलता है तथा विद्या-बुद्धि की अच्छी उन्नति होती है। १२७६ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भलग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी सम्बन्धों से लाभ भी मिलता है। धर्म का पालन भी करता है। अल्पायु में ही माता-पिता का वियोग हो जाता है। यश में भी कमी रहती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से अपनी चतुराई के बल से शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है तथा झगड़ों से लाभ होता है। १२७७ 'कुम्भ' लग्न में 'शनि' 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य एवं प्रभाव में वृद्धि होती है। यह यशस्वी तथा ऐश्वर्यशाली जीवन बिताने वाला होता है। तीसरी नीच-दृष्टि से तृतीय भाव से देखने से भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में कमी आती है। १२७८ सातवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री-पक्ष से असन्तोष रहता है तथा दैनिक व्यवसाय में परेशानी रहती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ बनी रहती हैं।