भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 53, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ स्वक्षेत्रस्थ 'राहु' स्वक्षेत्रस्थ 'राहु' जिस जातक की जन्मकुण्डली से 'राहु' स्वक्षेत्री (कन्या राशि का) हो, वह सुन्दर, यशस्वी तथा भाग्य- वान् होता है । स्वक्षेत्रस्थ 'केतु' स्वक्षेत्रस्थ 'केतु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' स्वक्षेत्री (मिथुन राशि का) हो, वह धैर्यवान्, कष्ट-सहिष्णु, कर्मठ, चिन्ताशील तथा गुप्त-युक्तियों वाला होता है। मित्र क्षेत्रस्थ ग्रहों का फलादेश अपने मित्रग्रह की राशि में स्थित विभिन्न ग्रहों का संक्षिप्त फलादेश निम्ना- नुसार समझना चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण-कुण्डलियां मेष लग्न की हैं। अन्य लग्नों की कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए । मित्रक्षेत्रस्थ 'सूर्य' मित्रक्षेत्रस्थ 'सूर्य' जिस जातक की कुण्डली में 'सूर्य' अपने मित्रग्रहों (चन्द्रमा, मंगल अथवा गुरु) की राशि (कर्क, मेष, धनु, वृश्चिक अथवा मीन) में स्थित हो, वह व्यवहारकुशल, यशस्वी, दानी, सौभाग्यवान्, शास्त्रज्ञ, सुप्रसिद्ध तथा दृढ़मैत्री करने वाला होता है ।