भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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५४१ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भलग्न : पंचमभाव : राहु पाँचवें भाव के मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित उच्च से राहु के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष से पहले कुछ कष्ट होता है, बाद में सुख मिलता है। विद्या तथा बुद्धि का विशेष लाभ होता है। यह अपनी भीतरी कमजोरी छिपाने में चतुर, प्रभावशाली, मधुर-भाषी तथा चतुर होता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भलग्न : षष्ठभाव : राहु छठे भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर भारी प्रभाव रखता है तथा झगड़े-झंझट आदि के मामलों में बुद्धि- बल से सफलता पाता है। भीतरी रूप से परेशान रहने पर भी वह धैर्य तथा साहस को नहीं छोड़ता और अन्त में सभी कठिनाइयों पर विजय पा लेता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भलग्न : सप्तमभाव : राहु सातवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से बहुत कष्ट होता है तथा दैनिक आमदनी के क्षेत्र में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, परन्तु अन्त में वह अपने धैर्य, हिम्मत तथा परिश्रम के बल पर सभी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर लेता है।