भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 533, कुल 638 में से

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५४२ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भ लग्न : अष्टमभाव : राहु आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक के जीवन पर अनेक संकट आते हैं तथा पुरातत्त्व की हानि भी होती है। पेट के निम्न भाग में विकार रहता है, फिर भी यह लम्बी आयु पाता है तथा स्वविवेक एवं बुद्धि के बल पर जीवन को प्रभावशाली ढंग से व्यतीत करता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भ लग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में बाधाएँ आती हैं तथा धर्म का पालन भी यथोचित नहीं होता, परन्तु अन्त में अपने बुद्धि-चातुर्य के बल पर यह सभी कठिनाइयों पर विजय पाकर उन्नति करता है तथा अपनी कमजोरियों को प्रकट नहीं होने देता। 'कुंभ' लग्न की कुंडली में 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भ लग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को पिता से कष्ट, राज्य से परेशानी तथा व्यवसाय में हानि का शिकार होना पड़ता है। परन्तु यह अपने परिश्रम तथा युक्ति-बल द्वारा कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए अन्त में सफलता भी पा लेता है।

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