भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 534, कुल 638 में से

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५४३ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भ लग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित नीच के 'राहु' के प्रभाव से जातक की आमदनी के मार्ग में बड़ी कठिनाइयाँ आती हैं, परन्तु वह अपने युक्ति-बल से उन पर थोड़ी-बहुत विजय पा लेता है और अपनी कठिनाइयों को किसी पर प्रकट भी नहीं होने देता । 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भ लग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को खर्च के बारे में बड़ी कठिनाइयां उठानी पड़ती हैं। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से उसे कुछ लाभ भी होता है। अपना खर्च चलाने के लिए उसे कठोर परिश्रम करना पड़ता है। 'कुम्भ' लग्न में 'केतु' 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के शरीर में कहीं चोट या घाव का निशान बनता है तथा शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती, धैर्यवान्, गुप्त-युक्ति-सम्पन्न तथा परिश्रमी होता है और इन्हीं गुणों के आधार पर सम्मान भी प्राप्त करता है।

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