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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

५४३ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भ लग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित नीच के 'राहु' के प्रभाव से जातक की आमदनी के मार्ग में बड़ी कठिनाइयाँ आती हैं, परन्तु वह अपने युक्ति-बल से उन पर थोड़ी-बहुत विजय पा लेता है और अपनी कठिनाइयों को किसी पर प्रकट भी नहीं होने देता । 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भ लग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को खर्च के बारे में बड़ी कठिनाइयां उठानी पड़ती हैं। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से उसे कुछ लाभ भी होता है। अपना खर्च चलाने के लिए उसे कठोर परिश्रम करना पड़ता है। 'कुम्भ' लग्न में 'केतु' 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के शरीर में कहीं चोट या घाव का निशान बनता है तथा शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती, धैर्यवान्, गुप्त-युक्ति-सम्पन्न तथा परिश्रमी होता है और इन्हीं गुणों के आधार पर सम्मान भी प्राप्त करता है।

५४४ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की धन तथा कुटुम्ब के सुख के विषय में कष्ट उठाना पड़ता है। कुटुम्ब में नित- नये उपद्रव होते रहते हैं। वह बड़े धैर्य, परिश्रम तथा न्याय-मार्ग से धन कमाने का प्रयत्न करता है और अन्त में कुछ सफलता भी पा लेता है। 'कुंभ लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम की अत्यधिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों के सुख में कमी आती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती, धैर्यवान्, परिश्रमी, उद्योगी तथा गुप्त युक्तियों वाला होता है तथा इन्हीं गुणों के बल पर अन्त में जीवन को उन्नत भी बनाता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को माता के सुख में हानि या कमी रहती है। मातृभूमि से वियोग भी होता है। भूमि तथा भवन के सुख में भी कमी आती है। परन्तु बाद में वह अपनी गुप्त युक्तियों के बल पर इन कमियों को दूर करने में थोड़ी-बहुत सफलता पा लेता है।

५४५ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को सन्तान का सुख पाने के लिए कष्ट-साध्य प्रयत्नों तथा गुप्त युक्तियों का सहारा लेना पड़ता है, फिर भी अल्प सुख ही प्राप्त होता है। विद्याध्ययन के क्षेत्र में भी बड़ी कठिनाइयाँ आती हैं। मस्तिष्क में अशान्ति रहती है तथा शील एवं विवेक भी कम होता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को शत्रुओं द्वारा अशान्ति मिलती है, परन्तु वह उन पर अपना प्रभाव स्थापित करने तथा विजय पाने में भी सफल हो जाता है। ऐसा व्यक्ति मन में भयभीत रहने पर भी प्रकट रूप में बड़ा हिम्मती तथा बहादुर होता है। वह धैर्यवान्, कठोर परिश्रमी तथा गुप्त युक्तियों का जानकार होता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से विशेष कष्ट मिलता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में संकटों का सामना करना पड़ता है। उसकी जननेन्द्रिय में विकार भी होता है। अन्त में, वह अपने परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के बल पर सामान्य सफलताएं भी पा लेता है।

५४६ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि तो होती है, परन्तु कई बार उसे मृत्यु-तुल्य कष्टों का सामना भी करना पड़ता है। पुरातत्त्व का सामान्य लाभ होता है तथा कई बार हानियां भी उठानी पड़ती हैं। अन्त में वह अपनी गुप्त युक्तियों के बल पर कठिनाइयों को दूर करने में सफल भी हो जाता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में बाधाएं आती हैं, धर्म की भी विशेष उन्नति नहीं हो पाती। परन्तु वह अपनी गुप्त युक्तियों, धैर्य एवं परिश्रम के बल पर भाग्य की उन्नति करता है और लगातार असफलताओं मिलने पर भी कभी निराश नहीं होता। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को अपने पिता से बहुत कष्ट मिलता है, राज्य से परेशानी तथा व्यवसाय के क्षेत्र में हानि होती है, फिर भी वह अपने धैर्य, साहस तथा युक्ति-बल से असफलताओं पर विजय प्राप्त करके ही रहता है।

५४७ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में सामान्य मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में अत्यधिक वृद्धि होती है तथा कभी-कभी आकस्मिक रूप से भी धन लाभ होता है। कभी कठिनाइयां आने पर भी धैर्य नहीं छोड़ता। ऐसा व्यक्ति अपनी उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहता है तथा न्याय-मार्ग से अत्यधिक धन कमाता और सुखी रहता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : द्वादशभाव : केतु बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, जिसके कारण परेशानी का अनुभव होता है, परन्तु वह अपनी गुप्त युक्तियों से उन पर विजय पाता है तथा निराशाओं में डूब जाने पर भी कभी हिम्मत नहीं हारता। उसे बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ भी होता रहता है।

५४८ 'मीन' लग्न

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(चार्ट के नीचे दाईं ओर: २३१४)

['मीन' लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों के फलादेश का पृथक्-पृथक् वर्णन]

'मीन' लग्न का फलादेश

'मीन' लग्न में जन्म लेने वाला जातक सामान्य कद का, बड़ी आँखों वाला तथा बड़े मस्तिष्क वाला होता है। उसकी ठोड़ी में गड्ढा होता है। ऐसा व्यक्ति मित्र प्रकृति वाला, सतोगुणी, प्रचण्ड, विनम्र, चतुर, चंचल, धूर्त, आलसी, रोगी, अल्पभोजी, श्रेष्ठ पण्डित, यशस्वी, सुरतिवान्, स्त्री-प्रिय, जल- क्रीड़ा करने में कुशल, बहु-सन्ततिवान् तथा श्रेष्ठ रत्नाभूषणों को धारण करने वाला होता है। 'मीन' लग्न वाले जातक की प्रारम्भिक अवस्था सामान्य ढंग से व्यतीत होती है, मध्यभावस्था में वह दुःखी रहता है तथा अन्तिम अवस्था में सुख भोगता है। 'मीन' लग्न वाले जातक का भाग्योदय २१-२२ वर्ष की आयु में होता है।

५४६ 'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्म-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों का स्थायी फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डली संख्या १३१५ से १४२२ के बीच देखना चाहिए। गोचर-कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए। 'मीन' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश १—'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३१५ से १३२६ के बीच देखना चाहिए। २—'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'सूर्य'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३१५ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३१६ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३१७ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३१८ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३१६ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३२० (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३२१ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३२२ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३२३ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३२४ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३२५ (ट) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३२६ 'मीन' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश १—'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'चन्द्रमा' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३२७ से १३३८ के बीच देखना चाहिए। २—'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित

५५० 'चन्द्रमा' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस दिन 'चन्द्रमा'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३२७ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३२८ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३२६ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३३० (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३३१ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३३२ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३३३ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३३४ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३३५ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३३६ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३३७ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३३८ 'मीन' लग्न में 'मंगल' का फलादेश १—'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल' का स्थायी फलादेश संख्या उदाहरण-कुण्डली १३३६ से १३५० के बीच देखना चाहिए। २—'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'मंगल'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३३६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३४० (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३४१ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३४२ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३४३ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३४४ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३४५ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३४६ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३४७ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३४८ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३४६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३५०.

५५१ 'मीन' लग्न में 'बुध' का फलादेश १—'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३५१ से १३६२ के बीच देखना चाहिए। २—'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'बुध'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३५१ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३५२ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३५३ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३५४ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३५५ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३५६ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३५७ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३५८ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३५६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३६० (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३६१ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३६२ 'मीन' लग्न में 'गुरु' का फलादेश १—'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३६३ से १३७४ के बीच देखना चाहिए। २—'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'गुरु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३६३ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३६४ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३६५ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३६६ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३६७

५५२ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३६८ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३६६ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३७० (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३७१ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३७२ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३७३ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३७४ 'मीन' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश १—'मीन' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३७५ से १३८६ के बीच देखना चाहिए। २—'मीन' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'शुक्र'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३७५ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३७६ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३७७ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३७८ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३७६ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३८० (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३८१ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३८२ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३८३ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३८४ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३८५ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३८६ 'मीन' लग्न में 'शनि' का फलादेश १. 'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३८७ से १३९८ के बीच देखना चाहिए। २. 'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि'

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का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए। जिस वर्ष में 'शनि'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३८७ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३८८ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३८९ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३९० (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३९१ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३९२ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३९३ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३९४ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३९५ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३९६ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३९७ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३९८ 'मीन' लग्न में 'राहु का फलादेश १. 'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३६६ से १४१० के बीच देखना चाहिए। २. 'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'राहु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३६६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १४०० (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १४०१ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १४०२ (ङ) 'सिंह' राशिपर हो तो संख्या १४०३ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १४०४ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १४०५ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १४०६ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १४०७ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १४०८ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १४०६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १४१०

५५४ 'मीन' लग्न में 'केतु' का फलादेश १. 'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्म-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १४११ से १४१२ के बीच देखना चाहिए। २. 'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १४११ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १४१२ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १४१३ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १४१४ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १४१५ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १४१६ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १४१७ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १४१८ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १४१६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १४२० (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १४२१ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १४२२ 'मीन' लग्न में 'सूर्य' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : प्रथमभाव : सूर्य पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की शारीरिक शक्ति एवं प्रभाव में वृद्धि होती है, परन्तु रक्त-विकार तथा अन्य रोग होने की सम्भावना भी रहती है। शत्रु-पक्ष पर विजय पाने तथा अपना सम्मान बढ़ाने के लिए उसे विशेष दौड़धूप करनी पड़ती है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के बाद स्त्री का सुख मिलता है तथा दैनिक आमदनी के लिए भी अधिक परिश्रम करना पड़ता है।

५५५ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में 'मंगल' की राशि पर स्थित उच्च के 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के प्रभाव एवं धन में वृद्धि होती है तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है। सातवीं नीच तथा शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के पक्ष में कुछ कमी आती है तथा दैनिक जीवन में भी परेशानियां रहती हैं। १७६६ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के पराक्रम की विशेष वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से कुछ वैमनस्य रहता रहता है। शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से शारीरिक श्रम द्वारा भाग्य की उन्नति तो होती है, परन्तु धर्म की उन्नति नहीं हो पाती। जीवन सामान्य ढंग से बीतता है। १७६७ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के सुख तथा प्रभाव में वृद्धि होती है, परन्तु माता, भूमि एवं भवन के सुख में कुछ कमी और परेशानियां भी रहती हैं। सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सहयोग, यश प्रतिष्ठा एवं प्रभाव की वृद्धि होती है। १७६८

५५६ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से कुछ कष्ट होता है, परन्तु कुछ कठिनाइयों के साथ विद्या- बुद्धि एवं वाणी की शक्ति में वृद्धि होती है। मस्तिष्क में चिन्ता एवं क्रोध का निवास भी रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से लाभ के मार्ग में कुछ कठिनाइयाँ आती हैं, परन्तु परि- श्रम द्वारा सफलता भी मिलती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में स्वराशि-स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक शत्रुओं पर विजय पाता है तथा झगड़े-झंझटों से लाभ उठाता है। उसे रोग आदि भी नहीं होते। वह बड़ा हिम्मती, धैर्यवान् तथा परिश्रमी होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च की परेशानी रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों से भी कुछ कष्ट होता है। खर्च की अधिकता से मन अशान्त रहता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक का स्त्री-पक्ष से कुछ वैमनस्य रहता है तथा दैनिक व्यवसाय में अधिक दौड़-धूप करने से ही सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से प्रभाव तथा सम्मान की वृद्धि होती है, परन्तु शारीरिक परेशानियां भी रहती हैं।

५५७ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित नीच के 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की आयु पर घोर संकट आते हैं तथा पुरातत्त्व-शक्ति की भी हानि होती है। शत्रु-पक्ष से भी कष्ट मिलता है। ननसाल-पक्ष दुर्बल रहता है। पेट के निम्न भाव में विकार भी होता है। सातवीं मित्र तथा उच्च-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कौटुम्बिक सुख की वृद्धि के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ता है। 'मीन' जन्म की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : नवमभाव : सूर्य नवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है तथा प्रभाव बढ़ता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों से कुछ विरोध रहता है तथा कुछ कठि- नाइयों के साथ पराक्रम, प्रभाव तथा पुरुषार्थ की वृद्धि होती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : नवमभाव : सूर्य दशवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक का अपने पिता से कुछ वैमनस्य रहता है राज्य के क्षेत्र में प्रभाव तथा सम्मान की वृद्धि होती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठि- नाइयां आती हैं। शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ माता, भूमि एवं भवन का सुख मिलता है।

५५८ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में स्वराशि-स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक कठिन परिश्रम द्वारा अपनी आमदनी की खूब बढ़ाता है। शत्रु-पक्ष पर भी विजय मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ विधा-बुद्धि एवं संतान के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। १३२५ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को खर्च चलाने में कुछ कठिनाइयाँ आती हैं तथा बाहरी सम्बन्धों से भी परेशानी रहती है। शत्रु-पक्ष भी कठिनाइयाँ उत्पन्न करता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से खर्च के बल पर शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति अहंकारी तथा क्रोधी भी होता है। १३२६ 'मीन' लग्न में 'चन्द्रमा' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य, सम्मान तथा यश की वृद्धि होती है। वह मधुरभाषी, सर्वप्रिय तथा प्रभावशाली होता है। उसे सन्तान तथा विद्या-बुद्धि का भी श्रेष्ठ लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से सुन्दर स्त्री मिलती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में बुद्धि- बल से अच्छा लाभ होता है। १३२७

५५६ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब की श्रेष्ठ शक्ति मिलती है। सन्तान-पक्ष से कुछ परेशानी होती है, फिर भी सन्तान तथा विद्या- बुद्धि का अच्छा लाभ होता है। सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि होती है तथा दैनिक जीवन आनन्दमय बना रहता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित उच्च के 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक के परा- क्रम तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है तथा विद्या एवं सन्तान-पक्ष का भी पूर्ण सहयोग मिलता है। सातवीं नीच-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति में रुकावटें आती हैं। ऐसा व्यक्ति असहिष्णु होता है, अतः उसे यश भी कम मिलता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता है। विद्या तथा संतान पक्ष में भी उन्नति होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से बुद्धि-बल से व्यवसाय में उन्नति होती है तथा राज्य- पक्ष से सम्मान तथा विद्या के सहयोग प्राप्त होता है। उसकी अनेक प्रकार से उन्नति होती है।

५६० 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : पंचमभाव : चन्द्र पाँचवें भाव में स्वराशि में स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का यथेष्ट लाभ होता है। वह वाक्पटु तथा मीठे स्वभाव का, गंभीर, दूर- दर्शी तथा स्थिर विचारों का व्यक्ति होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से बुद्धि-बल द्वारा उसकी आमदनी की वृद्धि होती है, यद्यपि उसे कुछ असन्तोष भी रहता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : षष्ठभाव : चन्द्र छठे भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष से अशान्ति रहती है, तथा बुद्धि-बल से उन पर प्रभाव स्थापित हो पाता है। सन्तान-पक्ष से कष्ट होता है तथा विद्याध्ययन में कठिनाइयाँ आती हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहने के कारण कष्ट होता है तथा बाहरी स्थानों से भी असन्तोषजनक लाभ होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : सप्तमभाव : चन्द्र सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को सुन्दर तथा बुद्धिमती स्त्री मिलती है। व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। सन्तान-पक्ष, घरेलू सुख तथा विद्या-बुद्धि की भी उन्नति होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव, सम्मान एवं योग्यता की वृद्धि होती है।

५६१ 'मीन' लग्न की कुंडली में 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : अष्टमभाव : चन्द्र आठवें भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। विद्या एवं सन्तान-पक्ष में कमी रहती है। धन तथा मस्तिष्क अशान्त रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव के देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति सामान्य जीवन बिताता है। १३३४ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : नवमभाव : चन्द्र नवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित नीच के 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति तथा धर्म पालन में रुकावटें आती हैं। सन्तान तथा विद्या का पक्ष भी कमजोर रहता है। मन-मस्तिष्क में परेशानियां रहती हैं। सातवीं उच्च-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों का सुख मिलता है तथा पराक्रम में पर्याप्त वृद्धि होती है। १३३५ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : दशमभाव : चन्द्र दसवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में वांछित सफलताएँ प्राप्त होती हैं। वह विद्वान्, नियमों का पालक, बुद्धिमान् तथा संतति- वान भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति धनी तथा भाग्यशाली होता है। १३३६

५६२ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : एकादशभाव : चन्द्र ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक अपने बुद्धि-बल द्वारा आमदनी में पर्याप्त वृद्धि करता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव को देखने से सन्तान एवं विद्या-बुद्धि-पक्ष की उन्नति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील बना रहता है। वह स्वार्थी तथा अपनी ही उन्नति की कामना करने वाला होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों से लाभ भी मिलता है। सन्तान-पक्ष से कष्ट तथा विद्या के क्षेत्र में कमी का सामना करना पड़ता है। मन-मस्तिष्क में परेशानी भी रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से बुद्धि-बल से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है। 'मीन' लग्न में मंगल 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक की शारीरिक शक्ति एवं प्रभाव में वृद्धि होती है। धन, कुटुम्ब तथा भाग्य की भी समृद्धि होती है। चौथी मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का पर्याप्त सुख मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से व्यवसाय तथा घरेलू सुख की वृद्धि होती है तथा स्त्री का पक्ष उत्तम रहता है। आठवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु की वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है।