भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५४ 'मीन' लग्न में 'केतु' का फलादेश १. 'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्म-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १४११ से १४१२ के बीच देखना चाहिए। २. 'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १४११ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १४१२ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १४१३ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १४१४ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १४१५ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १४१६ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १४१७ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १४१८ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १४१६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १४२० (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १४२१ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १४२२ 'मीन' लग्न में 'सूर्य' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : प्रथमभाव : सूर्य पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की शारीरिक शक्ति एवं प्रभाव में वृद्धि होती है, परन्तु रक्त-विकार तथा अन्य रोग होने की सम्भावना भी रहती है। शत्रु-पक्ष पर विजय पाने तथा अपना सम्मान बढ़ाने के लिए उसे विशेष दौड़धूप करनी पड़ती है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के बाद स्त्री का सुख मिलता है तथा दैनिक आमदनी के लिए भी अधिक परिश्रम करना पड़ता है।