भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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५५५ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में 'मंगल' की राशि पर स्थित उच्च के 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के प्रभाव एवं धन में वृद्धि होती है तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है। सातवीं नीच तथा शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के पक्ष में कुछ कमी आती है तथा दैनिक जीवन में भी परेशानियां रहती हैं। १७६६ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के पराक्रम की विशेष वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से कुछ वैमनस्य रहता रहता है। शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से शारीरिक श्रम द्वारा भाग्य की उन्नति तो होती है, परन्तु धर्म की उन्नति नहीं हो पाती। जीवन सामान्य ढंग से बीतता है। १७६७ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के सुख तथा प्रभाव में वृद्धि होती है, परन्तु माता, भूमि एवं भवन के सुख में कुछ कमी और परेशानियां भी रहती हैं। सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सहयोग, यश प्रतिष्ठा एवं प्रभाव की वृद्धि होती है। १७६८