भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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५५६ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से कुछ कष्ट होता है, परन्तु कुछ कठिनाइयों के साथ विद्या- बुद्धि एवं वाणी की शक्ति में वृद्धि होती है। मस्तिष्क में चिन्ता एवं क्रोध का निवास भी रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से लाभ के मार्ग में कुछ कठिनाइयाँ आती हैं, परन्तु परि- श्रम द्वारा सफलता भी मिलती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में स्वराशि-स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक शत्रुओं पर विजय पाता है तथा झगड़े-झंझटों से लाभ उठाता है। उसे रोग आदि भी नहीं होते। वह बड़ा हिम्मती, धैर्यवान् तथा परिश्रमी होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च की परेशानी रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों से भी कुछ कष्ट होता है। खर्च की अधिकता से मन अशान्त रहता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक का स्त्री-पक्ष से कुछ वैमनस्य रहता है तथा दैनिक व्यवसाय में अधिक दौड़-धूप करने से ही सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से प्रभाव तथा सम्मान की वृद्धि होती है, परन्तु शारीरिक परेशानियां भी रहती हैं।