भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४४ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की धन तथा कुटुम्ब के सुख के विषय में कष्ट उठाना पड़ता है। कुटुम्ब में नित- नये उपद्रव होते रहते हैं। वह बड़े धैर्य, परिश्रम तथा न्याय-मार्ग से धन कमाने का प्रयत्न करता है और अन्त में कुछ सफलता भी पा लेता है। 'कुंभ लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम की अत्यधिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों के सुख में कमी आती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती, धैर्यवान्, परिश्रमी, उद्योगी तथा गुप्त युक्तियों वाला होता है तथा इन्हीं गुणों के बल पर अन्त में जीवन को उन्नत भी बनाता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को माता के सुख में हानि या कमी रहती है। मातृभूमि से वियोग भी होता है। भूमि तथा भवन के सुख में भी कमी आती है। परन्तु बाद में वह अपनी गुप्त युक्तियों के बल पर इन कमियों को दूर करने में थोड़ी-बहुत सफलता पा लेता है।