भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४५ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को सन्तान का सुख पाने के लिए कष्ट-साध्य प्रयत्नों तथा गुप्त युक्तियों का सहारा लेना पड़ता है, फिर भी अल्प सुख ही प्राप्त होता है। विद्याध्ययन के क्षेत्र में भी बड़ी कठिनाइयाँ आती हैं। मस्तिष्क में अशान्ति रहती है तथा शील एवं विवेक भी कम होता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को शत्रुओं द्वारा अशान्ति मिलती है, परन्तु वह उन पर अपना प्रभाव स्थापित करने तथा विजय पाने में भी सफल हो जाता है। ऐसा व्यक्ति मन में भयभीत रहने पर भी प्रकट रूप में बड़ा हिम्मती तथा बहादुर होता है। वह धैर्यवान्, कठोर परिश्रमी तथा गुप्त युक्तियों का जानकार होता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से विशेष कष्ट मिलता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में संकटों का सामना करना पड़ता है। उसकी जननेन्द्रिय में विकार भी होता है। अन्त में, वह अपने परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के बल पर सामान्य सफलताएं भी पा लेता है।