भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मीन लग्न : पंचमभाव : मंगल पाँचवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित नीच के 'मंगल' के प्रभाव से जातक का सन्तान तथा विद्या का पक्ष दुर्बल रहता है। धन तथा कुटुम्ब के सुख तथा भाग्य एवं धर्म के पक्ष में भी कमी रहती है। चौथी सामान्य मित्रदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में कुछ वृद्धि होती है। सातवीं उच्चदृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी में वृद्धि होती है। बारहवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से असंतोषपूर्ण लाभ होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मीन लग्न : षष्ठभाव : मंगल छठे भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर बहुत प्रभाव रखता है। धन की कुछ कमी रहते हुए भी ठाठ से खर्च चलाता है। कुटुम्ब से थोड़ा सुख मिलता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में नवम भाव को देखने भाग्य की उन्नति तथा धर्म का पालन होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्ध भी असंतोषजनक रहते हैं। आठवीं मित्रदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक शक्ति, प्रभाव एवं सम्मान की वृद्धि होती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मीन लग्न : सप्तमभाव : मंगल सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को भाग्यशालिनी स्त्री मिलती है तथा व्यवसाय में भी लाभ होता है। वह धर्मात्मा तथा भाग्यवान् भी रहता है। चौथी मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं। आमदनी खूब बढ़ती है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, यश, प्रतिष्ठा तथा स्वाभिमान की वृद्धि होती है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब का पर्याप्त सुख मिलता है।