भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७४ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मीनलग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में बहुत कमी आती है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी हानि होती है। भाग्योन्नति में रुकावटें आती हैं। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम की अल्प वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों के सुख में कमी आती है। सातवीं उच्च-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान तथा विद्या-बुद्धि के सुख में उन्नति होती है। नवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री सुन्दर मिलती है तथा उससे सुख- सहयोग मिलता है। दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मीनलग्न : द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से भी असन्तोष होता है। शारीरिक सौन्दर्य, स्वास्थ्य, पिता, राज्य तथा व्यवसाय के सुख तथा लाभ में भी कमी रहती है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख प्राप्त होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु पक्ष में सफलता मिलती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम- भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है परन्तु दैनिक जीवन प्रभावपूर्ण बना रहता है। 'मीन' लग्न में 'शुक्र' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में सामान्य मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य, स्वास्थ्य तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। आयु भी लम्बी होती है। भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व शक्ति का लाभ होता है। दैनिक जीवन आनन्दमय बना रहता है। सातवीं मित्र तथा नीच-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री के सुख में कमी आती है, गृहस्थ जीवन असन्तोषपूर्ण रहता है तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती हैं।