भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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५७५ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : द्वितीयभाव : शुक्र दूसरे भाव में सामान्य मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक पुरुषार्थ द्वारा धन-वृद्धि का प्रयत्न करता है, परन्तु पूर्ण सफलता नहीं मिलती । कुटुम्ब के सुख में भी कुछ कमी रहती है । सातवीं दृष्टि से स्वराशि में अष्टम भाव को देखने से आयु की वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व-शक्ति का लाभ होता है । ऐसा व्यक्ति अपनी समझदारी से रईसी ढंग का जीवन बिताता है । 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में स्वराशि में स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों की शक्ति तो मिलती है, परन्तु उनसे कुछ परेशानी भी रहती है । पराक्रम की वृद्धि होती है । जातक को आयु तथा पुरातत्त्व का भी लाभ होता है । सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति में कुछ रुकावटें आती हैं, परन्तु वह अपने परिश्रम के बल पर पर्याप्त सुखी तथा समृद्ध जीवन बिताता है । 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का सुख कुछ कमी के साथ प्राप्त होता है, परन्तु आयु एवं पुरातत्त्व की वृद्धि होती है । पराक्रम बढ़ता है तथा भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है । सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के द्वारा सुख, सह- योग सम्मान तथा प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है, परन्तु लाभ में कुछ कमी रहती है ।