भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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५८३ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीनलग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का सुख प्राप्त नहीं होता। वह गुप्त युक्तियों के बल पर अपनी उन्नति के लिए प्रयत्न- शील रहता है तथा थोड़ी-बहुत सफलता भी पा लेता है, परन्तु कभी-कभी आर्थिक कष्ट उसे बहुत परेशान भी करते हैं। १४०० 'मीन लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीनलग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कमी तथा कष्ट का अनुभव होता है। वह बुद्धि एवं पुरुषार्थ द्वारा सफलता-प्राप्ति के प्रयत्न करता है तथा बहादुर और हिम्मती होता है। १४०१ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीनलग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित उच्च के 'राहु' के प्रभाव से जातक को माता का विशेष सुख मिलता है तथा गुप्त युक्तियों एवं परिश्रम के बल पर भूमि तथा भवन का सुख भी प्राप्त हो जाता है। कभी-कभी आकस्मिक रूप में भी सुख के साधन मिलते रहते हैं। १४०२