भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 587, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें५६७ मंगल और शनि [कुण्डली १४३८: लग्न (१) मं. श., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२] (१५) मंगल और शनि की युति हो तो जातक जादूगर, ऐन्द्रजालिक, कलह-प्रिय, चोर, मिथ्यावादी, शस्त्रज्ञ, शास्त्रज्ञ, मित्र-हीन, सुख-हीन, अपयशी, स्वधर्म की त्याग कर पर-धर्म ग्रहण करने वाला, उचित बात कहने वाला तथा विष अथवा मदिरा का निर्माता एवं विक्रेता होता है। बुध और गुरु [कुण्डली १४३९: लग्न (१) बु. गु., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२] (१६) बुध और गुरु की युति हो तो जातक धैर्यवान्, पण्डित, नीतिज्ञ, विनयी, उदार, गुणी, सुगन्ध- प्रिय तथा नृत्य-वाद्य में कुशल होता है। बुध और शुक्र [कुण्डली १४४०: लग्न (१) बु. शु., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२] (१७) बुध और शुक्र की युति हो तो जातक वेदज्ञ, नीतिज्ञ, शास्त्रज्ञ, प्रतापी, सुखी, शिल्पज्ञ, चतुर, सुन्दर, आनन्दी, धनी तथा अनेक लोगों पर हुकूमत करने वाला होता है। बुध और शनि [कुण्डली १४४१: लग्न (१) बु. श., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२] (१८) बुध और शनि की युति हो तो जातक चंचल- चित्त, कलह-प्रिय, उद्योगहीन, उचित बोलने वाला, भ्रमण- शील, संगीत-काव्य आदि में कुशल तथा दुर्बल शरीर वाला होता है।