भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
DevanagariHindipublished638 पृष्ठ
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[कुण्डली १६२०]
- लग्न (७): शनि | २: ८ | ३: ९ | ४: १० | ५: ११ | ६: १२ | ७: १ | ८: २ | ९: ३ | १०: ४ | ११: ५ | १२: ६
- चित्र संख्या: १६२०
(४८) तुला, धनु अथवा मीन राशि का शनि लग्न में स्थित हो, तो ऐसा जातक पृथ्वीपति (राजा) होता है।
[कुण्डली १६२१]
- लग्न (७): — | ४: १० | ७ (१): सूर्य | १० (४): गुरु | ११ (५): चन्द्र, बुध, शुक्र
- चित्र संख्या: १६२१
(४६) कर्क में 'गुरु', एकादश भाव में चन्द्रमा, बुध और शुक्र तथा मेष राशि में सूर्य हो, तो जातक पृथ्वीपति होता है।
[कुण्डली १६२२]
- लग्न (१०): शनि, चन्द्र | ८ (५): शुक्र
- चित्र संख्या: १६२२
(५०) लग्न में शनि और चन्द्रमा तथा अष्टम भाव में शुक्र हो, तो ऐसा जातक वेश्याप्रेमी मानी राजा होता है।
सिंहासन-योग
[कुण्डली १६२३]
- लग्न (१०): — | २ (११): बुध, सूर्य | ३ (१२): — | ६ (३): मंगल, राहु | ८ (५): केतु, गुरु | ९ (६): — | १२ (९): शुक्र
- चित्र संख्या: १६२३
षष्ठ, अष्टम, द्वितीय, तृतीय तथा द्वादश भाव में सभी ग्रह विद्यमान हों, तो ऐसा जातक राजसिंहासन पर बैठता है।